Wednesday, 29 April 2020

ये पैगाम है हर हिंदू का हर मुसलमान का

खामोशी का शोर

राजनीति के दलदल मे खो रहा अस्तित्व इंशान का, 
संविधान ही क्यो सवाल बन गया हर हिंदू का, हर एक मुसलमान का। 
एकता ही जिस भारत की संस्कृति है, संस्कृति ही सवाल बन गयी भारत के सम्मान का , 
सब के दिल में एक ही सवाल , क्या परिणाम होगा इस संग्राम का। 

उपरवाला भी खामोस हो गया सुन के फरियाद इंशान का, 
कौन सा दू वरदान इन्हे दोनों मेरे बच्चे,एक है हिंदू का और एक है मुसलमान का। 

कोई अर्जी लगाता मंदिर में, कोई खुदा से नमाज का, 
 अपने धर्म मे इंशानो ने ,बाँट दिया है धर्म अनाज का। 

इंशानियत का नाम रटते- रटते, रट गए नाम अपनी पहचान का, 
समझे नहीं सिलेबस को और बोलते है ,सारा दोस है परीक्षा के परिणाम का। 

कोई कहता मै बेटा अली का कोई कहता मै राम का, 
Ek 🙏 है जो वो सोच में पड़ गया, किसका मान मै रखू नवरात्रि का या फिर रमजान का। 

अब तो आंगन में आने वाले बच्चे भी सोचें, मैं किसका हिस्सा बनू रामायण का या मिलाद का, 
मेरी हो कुछ परवरिश,  मैं बेटा कहलाउ ना हिंदू का ना मुसलमान का

एक रंग है एक राग है, अब बात है भारत के अभिमान का, 
हम सब मिलकर एक बने और आओ मिलकर कद नापे आसमान का। 

फिर कभी ना आये हीनभावना ना झगडा हो तेरे मेरे सम्मान का, 
आओ मिलकर नवरात्रि मनाये और रोजा रखे रमजान का

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